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Sunday, May 17, 2020

सत्संग महिमा


एक संत के पास बहरा आदमी सत्संग सुनने आता था, उसके कान तो थे पर वे नाडिय़ों से जुड़े नहीं थे, एकदम बहरा, एक शब्द भी नहीं सुन सकता था।

किसी ने संत से कहा:- ‘‘बाबा जी, वह जो वृद्ध बैठे हैं वह कथा सुनते-सुनते हंसते तो हैं पर हैं बहरे।’’

बाबा जी सोचने लगे:- ‘‘बहरा होगा तो कथा सुनता नहीं होगा और कथा नहीं सुनता होगा तो रस नहीं आता होगा।
रस नहीं आता होगा तो यहां बैठना भी नहीं चाहिए, उठ कर चले जाना चाहिए, यह जाता भी नहीं है।’

बाबा जी ने इशारे से उस वृद्ध को अपने पास बुला लिया।

सेवक से कागज-कलम मंगाया और लिख कर पूछा:- ‘‘तुम सत्संग में क्यों आते हो?’’

उस वृद्ध ने लिख कर जवाब दिया:- ‘‘बाबा जी, सुन तो नहीं सकता हूं लेकिन यह तो समझता हूं कि ईश्वर प्राप्त महापुरुष जब बोलते हैं तो पहले परमात्मा में डुबकी मारते हैं।

संसारी आदमी बोलता है तो उसकी वाणी मन व बुद्धि को छूकर आती है लेकिन ब्रह्मज्ञानी संत जब बोलते हैं तो उनकी वाणी आत्मा को छूकर आती है।

मैं आपकी अमृतवाणी तो नहीं सुन पाता हूं पर उसके आंदोलन मेरे शरीर को स्पर्श करते हैं।
दूसरी बात आपकी अमृतवाणी सुनने के लिए जो पुण्यात्मा लोग आते हैं उनके बीच बैठने का पुण्य भी मुझे प्राप्त होता है ।’’

बाबा जी ने देखा कि यह तो ऊंची समझ के धनी हैं, उन्होंने कहा:- ‘‘मैं यह जानना चाहता हूं कि आप रोज सत्संग में समय पर पहुंच जाते हैं और आगे बैठते हैं, ऐसा क्यों?’’

उस वृद्ध ने लिखकर जबाब दिया:- ‘‘मैं परिवार में सबसे बड़ा हूं, बड़े जैसा करते हैं वैसा ही छोटे भी करते हैं।
मैं सत्संग में आने लगा तो मेरा बड़ा लड़का भी इधर आने लगा।
शुरूआत में कभी-कभी मैं बहाना बनाकर उसे ले आता था।

मैं उसे ले आया तो वह अपनी पत्नी को यहां ले आया, पत्नी बच्चों को ले आई, अब सारा कुटुम्ब सत्संग में आने लगा, कुटुम्ब को संस्कार मिल गए।’’

ब्रह्मचर्चा, आत्मज्ञान का सत्संग ऐसा है कि यह समझ में नहीं आए तो क्या, सुनाई नहीं देता हो तो भी इसमें शामिल होने मात्र से इतना पुण्य होता है कि व्यक्ति के जन्मों-जन्मों के पाप-ताप मिटने लगते हैं, पूरे परिवार का कल्याण होने लगता है।

फिर जो व्यक्ति श्रद्धा एवं एकाग्रतापूर्वक सुनकर इसका मनन करे उसके परम कल्याण में संशय ही क्या....

स्कन्द पुराण की एक ज्ञानवर्धक कथा

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*🌻〰️पापी मौज में, पुण्यात्मा कष्ट में. ये कैसा न्याय! ईश्वर हैं भी या नहीं !〰️🌻*
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आपके मन में कभी भी ऐसे प्रश्न आते हैं क्या- मैं तो इतनी पूजा-पाठ, भक्ति भाव में लीन हूं फिर भी मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है?

भगवान सारी परेशानियां मुझे ही क्यों देते हैं? दुष्ट लोग इतने सुखी हैं और धर्मात्मा ही सारे कष्ट भोग रहे हैं. ये क्या हो रहा है, क्यो  हो रहा है?

यदि ऐसा ही ईश्वर का न्याय तो मैं क्यों मानूं उन्हें, क्यों भजूं, क्यों जपूं, क्यों करूं पूजा? ईश्वर के पास तो न्याय है ही नहीं, ईश्वर तो निष्ठुर हैं. पत्थर की मूर्तियों में बसके पत्थर हो गए हैं…. आदि, आदि…

ऐसे प्रश्न अक्सर लोगों के मन में आते हैं खासकर तब जब वे बहुत परेशान होते हैं और दूसरों को सुखी देखते हैं. मनुष्य अपने सुख से ही संसार को सुखी मानता है, अपने दुख से ही संसार को व्यर्थ. यह सब स्वाभाविक है. तो आपके मन में जो प्रश्न आते हैं आज उनके निदान का कुछ प्रयास किया जाए. ध्यान से पढ़िएगा।

बहूदक नामक का एक तीर्थ था. यहां नन्दभद्र वैश्य रहते थे. धर्माचारी, सदाचारी पुरूष. उनकी साध्वी पत्नी का नाम कनका था. नंदभद्र चंद्रमौलि भगवान् शंकर के बड़े भक्त थे।

बहुदक में कपिलेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध शिवलिंग था. नंदभद्र तीनों समय कपिलेश्वर की पूजा किया करते थे. नंदभद्र कम से कम लाभ लेकर माल बेचा करते थे और ग्राहकों के साथ बराबरी और ईमानदारी का व्यवहार रखते।

गलत माल और बुरा सामान नहीं बेचते और जो कुछ मिल जाता उसी में संतुष्ट रहते थे. नंदभद्र का जीवन संन्यासियों जैसा था, सब नंदभद्र का सदाचारी, सम्पन्न, सुखमय जीवन की प्रशंसा करते।

नंदभद्र के पड़ोस में रहने वाला सत्यव्रत जो बड़ा ही नास्तिक एवं दुराचारी था, उनसे जलता था. सत्यव्रत चाहता था कि किसी प्रकार नंदभद्र का कोई दोष दिख जाए तो उसे धर्म के मार्ग से गिरा दूं।

नंदभद्र पर झूठे आरोप लगाना और सदा उनके दोष ही ढ़ूंढते रहना उसका स्वभाव बन गया था. दुर्भाग्यवश अचानक नंदभद्र का इकलौता पुत्र गम्भीर रूप से बीमार हो गया. नंदभद्र ने दुर्भाग्य मान शोक नहीं किया।

पुत्र के बाद उनकी पत्नी कनका भी गंभीर रूप से बीमार हो गयी. नंदभद्र पर विपतियां आयी देखकर उनके पड़ोसी सत्यव्रत को बड़ी खुशी हुई. उसने सोचा कि शायद नंदभद्र को धर्म से भटकाने का यही अवसर है।

उसने नन्दभद्र को सांत्वना देने का ढोंग करते हुए कहा- तुम्हारे जैसे धर्मात्मा को यह दु:ख उठाना पड़ रहा है. लगता है कि धर्म कर्म सब ढकोसला है. कई बार सोचा कि मैं तुमसे कहूं पर संकोचवश कहा नहीं।

दिन में तीन बार पूजा, स्तुति सब व्यर्थ है. भैया नंदभद्र! धर्म के नाम पर क्यों इतना कष्ट उठाते हो? जब से तुम इस पत्थर-पूजन में लगे हो, तब से कोई अच्छा फल तो मिला नहीं इकलौता पुत्र और पत्नी दोनों बीमार हैं. भगवान् होते तो क्या ऐसा फल देते?

पुण्य और पाप सब कुछ कल्पना है. नंदभद्र! तुम्हें तो मेरी यही सलाह होगी की झूठे धर्म को छोड़ आनंदपूर्वक खाओ, पीओ और भोगो, यही सत्य है।

सत्यव्रत की बातों का नंददभद्र पर कोई प्रभाव न पड़ा।

वह बोले-सत्यव्रतजी! आप अपने आप को ही धोखा दे रहे हैं. क्या पापियों पर दु:ख नहीं आते? क्या उनके पुत्र, स्त्री बीमार नहीं होते? जब सज्जन दु:खी होता है, तो लोग सहानुभूति जताते हैं. पर दुराचारी के दुःख पर कोई सहानुभूति नहीं दिखाता. अत: धर्म पालन करने वाला ही ठीक है. अंधा सूर्य को नहीं जानता, पर सूर्य तो है. ईश्वर के बिना संसार का संचालन नहीं हो सकता।

सत्यव्रत ने उसे टोक कर पूछा- देवता हैं तो दिखायी क्यों नहीं देते?

नंदभद्र ने कहा- देवता आपके पास आकर याचना नहीं करेंगे कि हमें आप मानिए. बातचीत बहस में बदलने लगी।

नंदभद्र अधिक विवाद नहीं चाहते थे, उठकर चले गये. पर उनके मन में यह विचार आया कि भगवान् सदाशिव का साक्षात् दर्शन करके पूछूं- आप आपके बनाये संसार सुख-दु:ख, जन्म-मरण आदि क्लेश क्यों है? यह दोषरहित क्यों नहीं है।

नंदभद्र शिवमंदिर आये. कपिलेश्वर लिंग की पूजा भगवान के आगमन की प्रतीक्षा करने लगे. सोच लिया कि जब तक भोलेनाथ दर्शन नहीं देंगे, तब तक मैं ऐसे ही खड़ा रहूँगा. लगातार तीन दिन और तीन रात नंदभद्र वैसे ही खड़े रहे।

चौथे दिन एक बालक उस मंदिर में आया. वह गलितकुष्ठ का रोगी भयानक पीड़ा से कराह रहा था।

उसने नंदभद्र से पूछा- आप इतने सुंदर एवं स्वस्थ हैं, फिर भी आप दुःखी क्यों लग रहे है?

नंदभद्र ने अपना संकल्प उसे बताया।

बालक ने कहा- अनचाहे का मिलना और मनचाहे का बिछुड़ना, इससे मानसिक कष्ट होता है. रोग और परिश्रम से शरीर को कष्ट होता है. मानसिक कष्ट से शारीरिक होता है और यदि शरीर में कष्ट हो तो मानसिक कष्ट होना स्वाभाविक ही है. दोनों एक दूसरे के साथ जुड़े हुए हैं।

फिर क्या किया जाए?- नंदभद्र ने पूछा

बंधुवर औषधि से शारीरिक कष्ट दूर होते हैं पर मानसिक कष्ट तो ज्ञान से ही दूर होता है.  मस्तिष्क को यदि ज्ञान की सही खुराक दी जाए तो वह कष्ट मुक्त हो जाता है।

बालक से ज्ञान भरी बात सुनकर नंदभद्र ने फिर पूछा- ज्ञानी बालक! आपकी बात से सहमत हूं, पर एक प्रश्न है. इस लोक में पापी मनुष्य भी इतने धनी और सुखी क्यों होते हैं? जबकि उन्हें तो उनके कर्मों के कारण कष्ट में होना चाहिए था, भगवान के विधान में यह दोष क्यों?

बालक ने कहा- सुख और दुख किसे कहते हैं यह समझ का फेर है. मैं आपको थोड़ा विस्तार से बताता हूं।

संसार में चार प्रकार के लोग हैं. पहले वे जिनके लिए इस लोक में तो सारे सुख सुलभ हैं, धन-दौलत, सत्ता, प्रभाव, बाहुबल सब कुछ परंतु परलोक में उन्हें कुछ भी प्राप्त नहीं होता. उनके पूर्वजन्मों के जो पुण्य शेष हैं, उसे वह इस लोक में भोग रहे हैं लेकिन वे नए पुण्य नहीं कमाते. ऐसे लोगों का सुखभोग केवल इसी लोक तक है. अगले जन्म के लिए वे कुछ शेष छोड़कर नहीं जा रहे तो उनका अगला जन्म बिल्कुल उसी रूप में होगा जिसे देखकर आज वे कांपने लगें।

दूसरे, वे लोग हैं जिनके लिए परलोक में सुख का भोग सुलभ है परंतु इस लोक में नहीं क्योंकि उनके पिछले जन्म के संचित पुण्य हैं ही नहीं. वे तपस्या करके नए पुण्य कमाते हैं. उससे परलोक में सुख का भोग प्राप्त होगा. तपस्या से अर्थ केवल देव साधना ही नहीं होता, कर्म साधना भी तप है. उचित कर्म किसी भी तप से कम नहीं क्योंकि इस संसार में रहते हुए सही मार्ग पर चलना कठोर साधना से ज्यादा कठिन है।

तीसरे, वे लोग हैं जिनके लिए इस लोक में भी और परलोक में भी सुख भोग मिलता है क्योंकि उसका पहले का किया हुआ पुण्य भी विद्यमान है और इस लोक में आकर भी वे उत्तम मार्ग का अनुसरण करते हुए कर्मतप से नये पुण्य बनाते रहते हैं. ऐसे लोग कोई-कोई ही होते हैं।

चौथे, वे जिनके लिए न तो इहलोक में सुख है और न परलोक में ही क्योंकि उनके पास पहले का कोई पुण्य संचित तो है नहीं और इस लोक में भी वे पुण्य कमा नहीं रहे. ऐसे नीच जनों को धिक्कार है. वे सर्वदा त्याग के योग्य हैं और इस लोक में अपमानित होते हुए ही जीवन बिताते हैं और न जाने कितने जीवन ऐसे ही बीतेंगे तब तक जब तक कि मेरी तरह उन्हें किसी तपस्वी का मार्गदर्शन न प्राप्त हो जाए।

इसलिए हे वैश्यवर! आप अपने पड़ोसियों, मित्रों द्वारा कही बात को मन में रखो ही नहीं. उन्हें तो अपने कान में भी प्रवेश न करने दो. आप इस जन्म में भगवान सदाशिव के भजन में लग जाएं  जिससे आप जन्म के बंधन से ही मुक्त हो सकते हैं।

एक छोटे बालक के मुख से ऐसी ज्ञानमयी और रहस्यपूर्ण बातें सुनकर नंदभद्र बड़े प्रसन्न हुए. उनका सारा भ्रम सारी शंका का निवारण हो चुका था।

उन्होंने चकित होकर पूछा – आप कौन हैं, अपना परिचय दें. आप यहां कैसे पधारे है? आपने मेरे सब संदेहों को दूर कर दिया. इतनी कम आयु में इतना ज्ञान आपको कैसे सुलभ हुआ?

बालक ने कहा- पूर्वजन्म में मैं अहंकारी, पाखण्ड़ी, व्याभिचारी था. जिसके चलते मैं वर्षो से नीच योनियों में भटका. भगवान व्यासदेव की ऐसी कृपा कि वे हर योनि में मुझे मुक्तिमार्ग बता देते हैं. उन्होंने ही मुझे आपके पास भेजा है. अब मैं सात दिन के बाद इसी तीर्थ में मरुंगा. आप मेरा अन्तिम संस्कार कर दीजिएगा।

वैश्यवर! ज्ञान का आयु से कोई संबंध नहीं है. ईश्वर को जिसे ज्ञान प्रदान करना होता है, जिसे माध्यम बनाकर उसे अपने भक्तों को जाग्रत करना होता है उसे चुन लेते हैं. वह कोई भी हो सकता है. मेरे जैसा कुष्ठ पीड़ित जीव भी. अतः सहज भाव से स्वीकार करना चाहिए और ज्ञान जिससे भी मिले उसके प्रति विनीत रहना चाहिए. ऐसा करने से ईश्वर सदा आपको ज्ञानवान बनाए रखते हैं, किसी न किसी को भेजते रहते हैं।

इतना बताकर उस बालक ने सूर्य मंत्र का जप करना आरंभ किया. कुष्ठ के निवारण के लिए सूर्यमंत्र का जप ही किया जाता है. भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र सांब ने भी सूर्य की उपासना से कोढ़ से मुक्ति पाई थी।

सातवें दिन उस बालक ने अपने प्राण त्याग दिए. नंदभद्र ने विधिपूर्वक उसका अन्तिम संस्कार किया।

नंदभद्र को जीवन की सचाई और सार्थकता का बोध हो गया था. शेष जीवन उन्होने भगवान् शिव और सूर्य की उपासना में लगा दिया तथा अन्त में जीवन मरण से मुक्ति पाकर भगवान शिव का साक्षात प्राप्त किया. (स्कन्दपुराण की कथा)

स्कंद पुराण की इस कथा से आपके मन के बहुत से भ्रम दूर हुए होंगे ऐसी ही आशा है। आपको जीवन में क्या मार्ग अपनाए रखना है इसका भी संकेत मिला होगा. पुराणों की कथाओं में जीवन के अनमोल रहस्य सांकेतिक रूप से दिए गए हैं.। वाट्सअप के माध्यम से मैं वहीं प्रयास करता हूं कि कथा से ज्यादा कथ्य यानी जो बात  कहने की कोशिश की गई होगी उसे समझा जाए, बताया जाए, अपनाया जाए।

Tuesday, May 2, 2017

Friend of GOD

एक बच्चा जला देने वाली गर्मी में नंगे पैर गुलदस्ते बेच रहा था।

लोग उसमे भी मोलभाव कर रहे थे।

एक सज्जन को उसके पैर देखकर बहुत दुःख हुआ, सज्जन ने बाज़ार से नया जूता ख़रीदा और उसे देते हुए कहा "बेटा लो, ये जूता पहन लो"

लड़के ने फ़ौरन जूते निकाले और पहन लिए

उसका चेहरा ख़ुशी से दमक उठा था.
वो उस सज्जन की तरफ़ पल्टा और हाथ थाम कर पूछा, "आप भगवान हैं?

"उसने घबरा कर हाथ छुड़ाया और कानों को हाथ लगा कर कहा, "नहीं बेटा, नहीं, मैं भगवान नहीं"

लड़का फिर मुस्कराया और कहा, "तो फिर ज़रूर भगवान के दोस्त होंगे,Bक्योंकि मैंने कल रात भगवान से कहा था कि मुझे नऐ जूते देदें".

वो सज्जन मुस्कुरा दिया और उसके माथे को प्यार से चूमकर अपने घर की तरफ़ चल पड़ा.

अब वो सज्जन भी जान चुके थे कि भगवान का दोस्त होना कोई मुश्किल काम नहीं..
.
खुशियाँ बाटने से मिलती है, मंदिर में नहीं।।

Thursday, February 23, 2017

The power of United

*आज एक नई सीख़ मिली*

जब अँगूर खरीदने बाजार गया ।

पूछा *"क्या भाव है?*

बोला : *"80 रूपये किलो ।"*

पास ही कुछ अलग-अलग टूटे हुए अंगूरों के दाने पडे थे ।

मैंने पूछा: *"क्या भाव है" इनका ?"*

वो बोला : *"30 रूपये किलो"*

मैंने पूछा : "इतना कम दाम क्यों..?

वो बोला : "साहब, हैं तो ये भी बहुत बढिया..!!  लेकिन ... *अपने गुच्छे से टूट गए हैं ।"*

मैं समझ गया कि ... *संगठन...समाज* और  *परिवार* से अलग होने पर हमारी कीमत......आधे से भी कम रह जाती है।

कृपया अपने *परिवार* एवम् *मित्रो*से हमेशा जुड़े रहे

Friday, September 30, 2016

How to be HAPPY

*सुखी रहने का तरीका*
*********************

      *एक बार की बात है संत तुकाराम अपने आश्रम में बैठे हुए थे। तभी उनका एक शिष्य, जो स्वाभाव से थोड़ा क्रोधी था उनके समक्ष आया और बोला-*

*गुरूजी, आप कैसे अपना व्यवहार इतना मधुर बनाये रहते हैं, ना आप किसी पे क्रोध करते हैं और ना ही किसी को कुछ भला-बुरा कहते हैं? कृपया अपने इस अच्छे व्यवहार का रहस्य बताइए?*

*संत बोले- मुझे अपने रहस्य के बारे में तो नहीं पता, पर मैं तुम्हारा रहस्य जानता हूँ !*

*“मेरा रहस्य! वह क्या है गुरु जी?” शिष्य ने आश्चर्य से पूछा।*

*”तुम अगले एक हफ्ते में मरने वाले हो!” संत तुकाराम दुखी होते हुए बोले।*

*कोई और कहता तो शिष्य ये बात मजाक में टाल सकता था, पर स्वयं संत तुकाराम के मुख से निकली बात को कोई कैसे काट सकता था?*

*शिष्य उदास हो गया और गुरु का आशीर्वाद ले वहां से चला गया।*

*उस समय से शिष्य का स्वभाव बिलकुल बदल सा गया। वह हर किसी से प्रेम से मिलता और कभी किसी पे क्रोध न करता, अपना ज्यादातर समय ध्यान और पूजा में लगाता। वह उनके पास भी जाता जिससे उसने कभी गलत व्यवहार किया था और उनसे माफ़ी मांगता। देखते-देखते संत की भविष्यवाणी को एक हफ्ते पूरे होने को आये।*

*शिष्य ने सोचा चलो एक आखिरी बार गुरु के दर्शन कर आशीर्वाद ले लेते हैं। वह उनके समक्ष पहुंचा और बोला-*

*गुरुजी, मेरा समय पूरा होने वाला है, कृपया मुझे आशीर्वाद दीजिये!”*

*“मेरा आशीर्वाद हमेशा तुम्हारे साथ है पुत्र। अच्छा, ये बताओ कि पिछले सात दिन कैसे बीते? क्या तुम पहले की तरह ही लोगों से नाराज हुए, उन्हें अपशब्द कहे?”*

*संत तुकाराम ने प्रश्न किया।*

*“नहीं-नहीं, बिलकुल नहीं। मेरे पास जीने के लिए सिर्फ सात दिन थे, मैं इसे बेकार की बातों में कैसे गँवा सकता था?*
*मैं तो सबसे प्रेम से मिला, और जिन लोगों का कभी दिल दुखाया था उनसे क्षमा भी मांगी” शिष्य तत्परता से बोला।*

*"संत तुकाराम मुस्कुराए और बोले, “बस यही तो मेरे अच्छे व्यवहार का रहस्य है।"*
*"मैं जानता हूँ कि मैं कभी भी मर सकता हूँ, इसलिए मैं हर किसी से प्रेमपूर्ण व्यवहार करता हूँ, और यही मेरे अच्छे व्यवहार का रहस्य है।*

*शिष्य समझ गया कि संत तुकाराम ने उसे जीवन का यह पाठ पढ़ाने के लिए ही मृत्यु का भय दिखाया था ।*

*वास्तव में हमारे पास भी सात दिन ही बचें हैं :-*

*रवि, सोम, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि, आठवां दिन तो बना ही नहीं है ।*

*"आइये आज से परिवर्तन आरम्भ करें।"*

Sunday, September 25, 2016

Human Character

मुल्ला नसरुद्दीन गया था ईद की नमाज पढ़ने ईदगाह। जब नमाज करने झुका तो उसके कुर्ते का एक छोर पाजामे में अटका रह गया पीछे। उसके पीछे के आदमी ने देखा, शोभा योग्य नहीं था, तो उसने झटका देकर कमीज को पाजामे से छुटकारा दिला दिया। वह जो पाजामे में अटक गया था छोर,उसको मुक्त कर दिया। मुल्ला नसरुद्दीन ने सोचा, होगा जरूर इसमें कोई राज! नहीं तो क्यों पीछेवाला आदमी झटका देगा! होगा इसमें कोई रिवाज! सो उसने आगेवाले आदमी के कमीज को पकड़कर झटका दिया।

आगेवाले आदमी ने भी सोचा कि शायद नमाज का यह हिस्सा है, सो उसने आगेवाले आदमी की कमीज को पकड़कर झटका दिया। आगेवाला आदमी चौंका,उसने कहा कि क्यों मेरी कमीज को झटका दे रहे हो? उसने कहा कि भाई, मुझसे न पूछो, पीछेवाले से पूछो। पीछेवाले से पूछा; उसने कहा, मुझसे न पूछो, यह मुल्ला नसरुद्दीन जो मेरे पीछे बैठा है! मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा मुझे तो बीच में डालो ही मत! मेरे पीछे जो बैठा है इसी कमबख्त ने मेरी कमीज को झटका दिया। फिर यह सोचकर कि नमाज तो व्यवस्था से करनी चाहिए, मैंने भी झटका दिया। मेरा इसमें कोई हाथ नहीं।

और सदियों—सदियों से ऐसा तुम कर रहे हो। इस करने का नाम चरित्र है। चरित्र है. अनुकरण। न बोध है, न बुद्धि है. न सोचा है, न समझा है, न ध्याया है; और कर रहे हैं 

ओशो

Sunday, February 21, 2016

Goal of life

एक ऐसी कहानी जिसे पढ़कर कई लोगोँ के सोचने का नजरिया बदल गया.... अवश्य पढ़ेँ

डा. मार्क एक प्रसिद्ध कैंसर स्पैश्लिस्ट हैं, एक बार किसी सम्मेलन में भाग लेने लिए किसी दूर के शहर जा रहे थे। वहां उनको उनकी नई मैडिकल रिसर्च के महान कार्य  के लिए पुरुस्कृत किया जाना था। वे बड़े उत्साहित थे व जल्दी से जल्दी वहां पहुंचना चाहते थे। उन्होंने इस शोध के लिए बहुत मेहनत की थी। बड़ा उतावलापन था, उनका उस पुरुस्कार को पाने के लिए।

उड़ने के लगभग दो घण्टे बाद उनके जहाज़ में तकनीकी खराबी आ गई, जिसके कारण उनके हवाई जहाज को आपातकालीन लैंडिंग करनी पड़ी। डा. मार्क को लगा कि वे अपने सम्मेलन में सही समय पर नहीं पहुंच पाएंगे, इसलिए उन्होंने स्थानीय कर्मचारियों से रास्ता पता किया और एक टैक्सी कर ली, सम्मेलन वाले शहर जाने के लिए। उनको पता था की अगली प्लाईट 10 घण्टे बाद है। टैक्सी तो मिली लेकिन ड्राइवर के बिना इसलिए उन्होंने खुद ही टैक्सी चलाने का निर्णय लिया।

जैसे ही उन्होंने यात्रा शुरु की कुछ देर बाद बहुत तेज, आंधी-तूफान शुरु हो गया। रास्ता लगभग दिखना बंद सा हो गया। इस आपा-धापी में वे गलत रास्ते की ओर मुड़ गए। लगभग दो घंटे भटकने के बाद उनको समझ आ गया कि वे रास्ता भटक गए हैं। थक तो वे गए ही थे, भूख भी उन्हें बहुत ज़ोर से लग गई थी। उस सुनसान सड़क पर भोजन की तलाश में वे गाड़ी इधर-उधर चलाने लगे। कुछ दूरी पर उनको एक झोंपड़ी दिखी।

झोंपड़ी के बिल्कुल नजदीक उन्होंने अपनी गाड़ी रोकी। परेशान से होकर गाड़ी से उतरे और उस छोटे से घर का दरवाज़ा खटखटाया। एक स्त्री ने दरवाज़ा खोला। डा. मार्क ने उन्हें अपनी स्थिति बताई और एक फोन करने की इजाजत मांगी। उस स्त्री ने बताया कि उसके यहां फोन नहीं है। फिर भी उसने उनसे कहा कि आप अंदर आइए और चाय पीजिए। मौसम थोड़ा ठीक हो जाने पर, आगे चले जाना।

भूखे, भीगे और थके हुए डाक्टर ने तुरंत हामी भर दी। उस औरत ने उन्हें बिठाया, बड़े सम्मान के साथ चाय दी व कुछ खाने को दिया। साथ ही उसने कहा, "आइए, खाने से पहले भगवान से प्रार्थना करें और उनका धन्यवाद कर दें।"

डाक्टर उस स्त्री की बात सुन कर मुस्कुरा दिेए और बोले,"मैं इन बातों पर विश्वास नहीं करता। मैं मेहनत पर विश्वास करता हूं। आप अपनी प्रार्थना कर लें।"

टेबल से चाय की चुस्कियां लेते हुए डाक्टर उस स्त्री को देखने लगे जो अपने छोटे से बच्चे के साथ प्रार्थना कर रही थी। उसने कई प्रकार की प्रार्थनाएं की। डाक्टर मार्क को लगा कि हो न हो, इस स्त्री को कुछ समस्या है। जैसे ही वह औरत अपने पूजा के स्थान से उठी, तो डाक्टर ने पूछा,"आपको भगवान से क्या चाहिेए? क्या आपको लगता है कि भगवान आपकी प्रार्थनाएं सुनेंगे?"

उस औरत ने धीमे से उदासी भरी मुस्कुराहट बिखेरते हुए कहा,"ये मेरा लड़का है और इसको एक रोग है जिसका इलाज डाक्टर मार्क नामक व्यक्ति के पास है परंतु मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं कि मैंं उन तक, उनके शहर जा सकूं क्योंकि वे दूर किसी शहर में रहते हैं। यह सच है की कि भगवान ने अभी तक मेरी किसी प्रार्थना का जवाब नहीं दिया किंतु मुझे विश्वास है कि भगवान एक न एक दिन कोई रास्ता बना ही देंगे। वे मेरा विश्वास टूटने नहीं देंगे। वे अवश्य ही मेरे बच्चे का इलाज डा. मार्क से करवा कर इसे स्वस्थ कर देंगे।"

डाक्टर मार्क तो सन्न रह गए। वे कुछ पल बोल ही नहीं पाए। आंखों में आंसू लिए धीरे से बोले,"भगवान बहुत महान हैं।"

(उन्हें सारा घटनाक्रम याद आने लगा। कैसे उन्हें सम्मेलन में जाना था। कैसे उनके जहाज को इस अंजान शहर में आपातकालीन लैंडिंग करनी पड़ी। कैसे टैक्सी के लिए ड्राइवर नहीं मिला और वे तूफान की वजह से रास्ता भटक गए और यहां आ गए।)

वे समझ गए कि यह सब इसलिए नहीं हुआ कि भगवान को केवल इस औरत की प्रार्थना का उत्तर देना था बल्कि भगवान उन्हें भी एक मौका देना चाहते थे कि वे भौतिक जीवन में धन कमाने, प्रतिष्ठा कमाने, इत्यादि से ऊपर उठें और असहाय लोगों की सहायता करें।

वे समझ गए की भगवान चाहते हैं कि मैं उन लोगों का इलाज करूं जिनके पास धन तो नहीं है किंतु जिन्हें भगवान पर विश्वास है !

हर इंसान को ये ग़लतफहमी होती है की जो हो रहा है, उस पर उसका कण्ट्रोल है और वह इन्सान ही सब कुछ कर रहा है ।।
पर अचानक ही कोई अनजानी ताकत सबकुछ बदल देती है कुछ ही सेकण्ड्स लगते हैं सबकुछ बदल जाने में फिर हम याद करते हैं परमपिता परमात्मा  को।

या ईश्वर को छोड़ दो...
या ईश्वर के ऊपर छोड़ दो